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Hindi
हिन्दी (ऐच्छिक)
HINDI (Elective)
Time : 3 Hours 
निर्धारित समय : 3 घण्टे 
Maximum Marks : 100
अधिकतम अंक : 100 

सामान्य निर्देश:
(i) इस प्रश्न-पत्र में 14 प्रश्न हैं ।
(ii) सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
(iii) विद्यार्थी यथासंभव अपने शब्दों में उत्तर लिखें।
खण्ड क

प्र.1. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िए और पूछे गए प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में (20 - 30 शब्दों में) लिखिए :
‘दाँत’ - इस दो अक्षर के शब्द तथा इन थोड़ी-सी छोटी-छोटी हड्डियों में भी उस चतुर कारीगर ने वह कौशल दिखलाया है कि किसके मुँह में दाँत हैं जो पूरा वर्णन कर सके। मुख की सारी शोभा और सभी भोज्य पदार्थों का स्वाद इन्हीं पर निर्भर है । कवियों ने अलक, भ्रू तथा बरौनी आदि की छवि लिखने में बहुत रीति से बाल की खाल निकाली है पर सच पूछिए तो इन्हीं की शोभा से सबकी शोभा है । जब दाँतों के बिना पोपला-सा मुँह निकल आता है और चिबुक एवं नासिका एक में मिल जाती हैं, उस समय सारी सुधराई मिट्टी में मिल जाती है । कवियों ने इनकी उपमा हीरा, मोती, माणिक से दी है, यह बहुत ठीक है 

यह वह अंग है जिसमें पाकशास्त्र के छहों रस एवं काव्यशास्त्र के नवों रस का आधार है । खाने का मज़ा इन्हीं से है । इस बात का अनुभव यदि आपको न हो तो किसी वृद्ध से पूछ देखिए । केवल सतुआ चाटने के और रोटी को दूध में तथा दाल में भिगोकर गले के नीचे उतारने के सिवाय दुनिया भर की चीज़ों के लिए वह तरस कर ही रह जाता होगा ।

सच है दाँत बिना जब किसी काम के न रहें तब पूछे कौन ? शंकराचार्य का यह पद महामंत्र है “अंगं गलितं पलितं मुंडे दशनविहीनं जातं तुंडम्” आदि । एक कहावत भी है - दाँत खियाने, खुर घिसे, पीठ बोझ नहिं लेइ,
                  ऐसे बूढ़े बैल को कौन बाँध भुस देइ ।”

आपके दाँत हाथी के दाँत तो हैं नहीं कि मरने पर भी किसी के काम आएँगे । आपके दाँत तो यह शिक्षा देते हैं कि जब तक हम अपने स्थान, अपनी जाति (दंतावली) और अपने काम में दृढ़ हैं, तभी तक हमारी प्रतिष्ठा है । यहाँ तक कि बड़े-बड़े कवि हमारी प्रशंसा करते हैं । पर मुख से बाहर होते ही एक अपावन, घृणित और फेंकने वाली हड्डी हो जाते हैं । गाल और होंठ दाँतों का परदा हैं । जिसके परदा न रहा अर्थात् स्वजातित्व की औरतदारी न रही, उनकी निर्लज्ज ज़िंदगी व्यर्थ है । ऐसा ही हम उन स्वार्थ के अंधों के हक में मानते हैं जो रहे हमारे साथ, बने हमारे साथ ही, पर सदा हमारे देश-जाति के अहित ही में तत्पर रहते हैं । उनके होने का हमें कौन सुख ? दुखती दाढ़ की पीड़ा से मुक्ति उसके उखड़वाने में ही है। हम तो उन्हीं की जै-जै कार करेंगे जो अपने देशवासियों से दाँत काटी रोटी का बर्ताव रखते हैं।

(क) कैसे कह सकते हैं कि दाँतों का निर्माण चतुर कारीगर ने किया है और इन्हीं की शोभा से सारी शोभा है ? । 

2
(ख) कवियों ने दाँतों की उपमा किन वस्तुओं से दी है ? उपमा का कारण भी स्पष्ट कीजिए । 

2
(ग) भोजन के आनंद में दाँतों का क्या योगदान है ? इसे समझने के लिए किसी वृद्ध के पास जाना क्यों ज़रूरी बताया है ? ।

2
(घ) दाँतों की प्रतिष्ठा कब तक है ? मुख से बाहर होते ही उनके साथ भिन्न व्यवहार क्यों होता है ? 

2
(ङ) शंकराचार्य के कथन और एक अन्य कहावत के द्वारा लेखक क्या समझाना चाहता है ? 

2
(च) गाल और होंठ दाँतों का परदा कैसे हैं ? उस परदे से क्या शिक्षा मिलने की बात कही गई है ? ।

2
(छ) दाँतों की चर्चा में देश का अहित करने वालों का उल्लेख क्यों किया गया है ? लेखक के अनुसार उनसे कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए ? 

2
(ज) इस गद्यांश का एक उपयुक्त शीर्षक सुझाइए । (अधिकतम 5 शब्द)

1
प्र.2. निम्नलिखित काव्यांश को पढ़िए और पूछे गए प्रश्नों के उत्तर (प्रत्येक लगभग 20 शब्दों में) दीजिए : 

    तन समर्पित, मन समर्पित
    और यह जीवन समर्पित
    चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दें।
    माँ, तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,
    किंतु इतना कर रहा फिर भी निवेदन ।
    थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब भी
    कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण ।
    मान अर्पित, प्राण अर्पित
    रक्त का कण-कण समर्पित
    चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दें ।
    कर रहा आराधना मैं आज तेरी,
    एक विनती तो करो स्वीकार मेरी ।
    भाल पर मल दो चरण की धूल थोड़ी
    शीष पर आशीष की छाया घनेरी
    स्वप्न अर्पित, प्रश्न अर्पित
    आयु का क्षण-क्षण समर्पित
    चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दें।

    तोड़ता हूँ मोह का बंधन क्षमा दो।
    गाँव मेरे, वार, घर, आँगन क्षमा दो
    देश का जयगान अधरों पर सजा हो
    देश का ध्वज हाथ में केवल थमा हो
    सुमन अर्पित, चमन अर्पित
    नीड़ का तृण-तृण समर्पित
    चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दें।

(क) तन-मन अर्पित करने पर भी कुछ और देने की चाह क्यों है ? 1
(ख) मातृभूमि का ऋण चुकाने के लिए कवि अपनी किस भेंट को स्वीकार लेने का आग्रह कर रहा है ? 1
(ग) तन और मन का समर्पण कैसे हो सकता है ? 1
(घ) कविता में किस-किस से और क्यों क्षमा माँगी गई है ? 1
(ङ) कविता के संदर्भ में चमन' और 'नीड़' का प्रतीकार्थ स्पष्ट कीजिए। 1

खण्ड ख

प्र.3. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 300 शब्दों में निबन्ध लिखिए : 10
(क) आतंकवाद : एक विश्वव्यापी समस्या
(ख) लोकतंत्र और मीडिया 
(ग) हिन्दी में रोज़गार की संभावनाएँ 
(घ) थमती क्यों नहीं महँगाई

प्र.4. पत्रकारिता के क्षेत्र में अध्ययन पूरा करने के उपरांत पत्रकार के रूप में कार्य करने के लिए। किसी प्रतिष्ठित समाचार-पत्र के संपादक को लगभग 150 शब्दों में एक आवेदन-पत्र लिखिए और यह भी उल्लेख कीजिए कि आप उसी पत्र के साथ क्यों जुड़ना चाहते हैं ।

5
अथवा

राष्ट्रीय स्वच्छता-अभियान के लाभों और उसकी सीमाओं की समीक्षा करते हुए किसी प्रतिष्ठित समाचार-पत्र के संपादक को लगभग 150 शब्दों में पत्र लिखिए ।

प्र.5. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में, प्रत्येक 20 - 30 शब्दों में दीजिए : 

(क) उलटा पिरामिड शैली से क्या तात्पर्य है ?  1
(ख) खोजी रिपोर्ट किसे कहते हैं ?  1
(ग) समाचार लिखने के छह ‘ककारों के नाम लिखिए ।  1
(घ) प्रधान संपादक के दो कार्यों का उल्लेख कीजिए ।  1
(ङ) स्तंभ-लेखन से क्या तात्पर्य है ?

1
प्र.6. “पर्यावरण से जुड़ा हमारा भविष्य” विषय पर एक आलेख लगभग 150 शब्दों में लिखिए । 5

खण्ड ग

प्र.7. निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या लगभग 150 शब्दों में कीजिए :

    मुझ भाग्यहीन की तू संबल
    युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
    दुख ही जीवन की कथा रही
    क्या कहूँ आज, जो नहीं कही !
    हो उसी कर्म पर वज्रपात
    यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
    इस पथ पर मेरे कार्य सकल
    हों भ्रष्ट शीत के से शतदल !
    कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
    कर, करता मैं तेरा तर्पण !

प्र.8. निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर प्रत्येक 30 - 40 शब्दों में दीजिए : (3+3=6)

(क) वसंत आया’ कविता में कवि की मुख्य चिंता क्या है और क्यों ? स्पष्ट कीजिए ।

(ख) दीप अकेला' का प्रतीकार्थ समझाते हुए बताइए कि व्यष्टि का समष्टि में विलय क्यों और कैसे संभव है ?

(ग) “भरत-राम का प्रेम में “मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ” भरत के इस कथन के आलोक में राम के स्वभाव की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।

प्र.9. निम्नलिखित में से किन्हीं दो काव्यांशों का काव्य-सौन्दर्य प्रत्येक 30 - 40 शब्दों में स्पष्ट कीजिए : (3+3=6)
(क) हेम कुंभ ले उषा सवेरे - भरती ढुलकाती सुख मेरे ।
      मदिर ऊँघते रहते जब – जगकर रजनी भर तारा ।।

(ख) पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भंवरा ऐ काग ।।
      सो धनि विरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग ।।

(ग) किसी अलक्षित सूर्य को
     देता हुआ अर्घ्य 
     शताब्दियों से इसी तरह
     गंगा के जल में
     अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर
     अपनी दूसरी टाँग से
     बिलकुल बेखबर ।  

प्र.10. निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या लगभग 150 शब्दों में कीजिए :

6
    नाम इसलिए बड़ा नहीं है कि वह नाम है । वह इसलिए बड़ा होता है कि उसे सामाजिक स्वीकृति मिली होती है । रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य । नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है । आधुनिक शिक्षित लोग जिसे सोशल सैंक्शन' कहा करते हैं । मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात ।

प्र.11. निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर प्रत्येक लगभग 50 शब्दों में दीजिए : (4+4=8) 

(क) “वह लड्डू' की पुकार जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का  मधुर मर्मर था, भरे काठ की अलमारी की सिर दुखाने वाली खड़खड़ाहट नहीं” - लेखक के इस कथन का आशय स्पष्ट करते हुए ‘बालक बच गया' लघु निबन्ध के संदेश पर प्रकाश डालिए । 

(ख) संवदिया' के आधार पर हरगोबिन के चरित्र की किन्हीं चार विशेषताओं पर सोदाहरण प्रकाश डालिए । 

(ग) “दूसरा देवदास' कहानी की मूल-संवेदना तथा उसके शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए ।

प्र.12. ब्रजमोहन व्यास अथवा असगर वजाहत के जीवन तथा रचनाओं का संक्षिप्त परिचय देते हुए। उनकी भाषा-शैली की किन्हीं दो विशेषताओं पर लगभग 200 शब्दों में सोदाहरण प्रकाश डालिए ।

6
अथवा

विष्णु खरे अथवा घनानंद के जीवन तथा रचनाओं का संक्षेप में उल्लेख करते हुए उनकी किन्हीं दो काव्यगत विशेषताओं पर लगभग 200 शब्दों में सोदाहरण प्रकाश डालिए ।

खण्ड घ

प्र.13. “तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे ।” इस कथन के आलोक में सूरदास के जीवन से प्राप्त होने वाले मूल्यों की चर्चा लगभग 150 शब्दों में कीजिए ।

5
प्र.14. (क) “बिसनाथ मान ही नहीं सकते कि बिस्कोहर से अच्छा कोई गाँव हो सकता है। - लेखक की इस धारणा के पीछे निहित कारणों की चर्चा लगभग 150 शब्दों में कीजिए । 5

(ख) ‘आरोहण' कहानी के आधार पर लगभग 150 शब्दों में प्रतिपादित कीजिए कि पहाड़ों का जीवन विविध संघर्षों का जीवन है ।'
5

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